विवेकानन्द के मत में धर्म वह नैतिक बल है जो व्यक्ति तथा राष्ट्र को शक्ति प्रदान करता है। वे धर्म को व्यक्ति व समाज दोनों के लिए उपयोगी मानते थे वे हिन्दू धर्म को समस्त धर्मों का स्त्रोत मानते थे। वे उनकी धर्म की मीमांसा सार्वभौमिक थी। उनके अनुसार हिन्दू धर्म में कोई दोष नहीं है, बल्कि दोष धर्म के गलत प्रयोग में है।
Leave a comment